इस्लाम के इतिहास में 10 मुहर्रम 61 हिजरी (10 अक्टूबर 680 ईस्वी) का दिन एक ऐसा मोड़ है, जिसने पूरी दुनिया को मानवता, आत्मसम्मान और हक़ (सच्चाई) के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का पाठ पढ़ाया। यह कोई सामान्य युद्ध या सत्ता का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह ज़ुल्म (अन्याय) के खिलाफ मज़लूम (पीड़ित) की आवाज़ थी। एक तरफ हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) थे, जो पैगंबर हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) के नवासे (नाती) और हज़रत अली व सैयदा फ़ातिमा के छोटे सुपुत्र थे। दूसरी तरफ यज़ीद इब्ने मुआविया था, जो अपनी क्रूरता, अनैतिकता और तानाशाही के दम पर पूरे इस्लामिक साम्राज्य पर राज करना चाहता था।
कर्बला की कहानी केवल एक दिन की जंग नहीं है, बल्कि यह मदीना से शुरू होकर मक्का, मक्का से कर्बला के तपते मैदान और फिर दमिश्क के दरबारों तक फैली एक लंबी दास्तान है। इस वाक़ये को समझने के लिए हमें उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझना होगा।
पैगंबर मोहम्मद साहब के दुनिया से पर्दा करने के बाद, इस्लाम में 'खिलाफत' (Democratic Islamic Leadership) की व्यवस्था थी, जिसमें समाज का सबसे योग्य और धार्मिक व्यक्ति सर्वसम्मति से नेता चुना जाता था। इसे 'ख़िलाफ़त-ए -राषिदा' कहा गया। हज़रत अबू बक्र, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान और हज़रत अली (रज़ि.) के दौर तक यह व्यवस्था बेहतरीन तरीके से चली।
हज़रत अली की शहादत के बाद स्थिति बदलने लगी। सीरिया के गवर्नर अमीर मुआविया ने सत्ता संभाली। अमीर मुआविया की वफ़ात (मृत्यु) के समय, उन्होंने अपने बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर किया। यह इस्लाम के इतिहास में पहली बार हुआ जब खिलाफत को 'राजशाही' (Monarchy) या वंशवाद में बदल दिया गया।
यज़ीद एक अय्याश, क्रूर और अनैतिक शासक था। वह खुलेआम इस्लामिक नियमों का उल्लंघन करता था, शराब पीता था, जुआ खेलता था और प्रजा पर अत्याचार करता था। वह चाहता था कि मुस्लिम समाज के सबसे सम्मानित और पवित्र लोग उसकी सत्ता को स्वीकार करें ताकि उसके गलत कामों को धार्मिक वैधता (Legitimacy) मिल सके। यज़ीद जानता था कि जब तक मदीना के पवित्र घराने (अहले-बैत) के लोग उसके हाथ पर 'बैअत' (वफ़ादारी की शपथ) नहीं लेते, तब तक आम जनता उसे पूरी तरह अपना खलीफा नहीं मानेगी।
यज़ीद ने तख्त पर बैठते ही मदीना के गवर्नर वलीद इब्ने उत्बा को खत लिखा। उस खत में साफ निर्देश था: "हुसैन इब्ने अली, अब्दुल्ला इब्ने उमर और अब्दुल्ला इब्ने ज़ुबैर से मेरे नाम की बैअत लो। अगर वे इंकार करें, तो उनका सिर कलम कर दो।"
जब गवर्नर ने इमाम हुसैन को अपने दरबार में बुलाया और यज़ीद का संदेश सुनाया, तो इमाम हुसैन ने ऐतिहासिक शब्द कहे:
"मुझ जैसा इंसान, यज़ीद जैसे इंसान की बैअत (गुलामी) कभी नहीं कर सकता।"
यह लड़ाई किसी ज़मीन के टुकड़े की नहीं थी। इमाम हुसैन जानते थे कि अगर उन्होंने यज़ीद के आगे घुटने टेक दिए, तो इस्लाम का चेहरा हमेशा के लिए बदल जाएगा। लोग ज़ुल्म को ही धर्म समझने लगेंगे। उन्होंने इस्लाम के मूल सिद्धांतों (न्याय, समानता और शांति) की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने का फैसला कर लिया
मदीना में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए थे। इमाम हुसैन अपने नाना (पैगंबर मोहम्मद) के शहर और उनकी कब्र को छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन वे मदीना की धरती पर खून-खराबा भी नहीं चाहते थे। इसलिए, 28 रजब 60 हिजरी को इमाम हुसैन ने अपने पूरे परिवार, बहनों, भाइयों और बच्चों के साथ मदीना छोड़ दिया और मक्का की ओर रुख किया।
मक्का में 3 शाबान से लेकर ज़िलहिज्जा (इस्लामिक कैलेंडर का आखिरी महीना) तक इमाम हुसैन रहे। इसी दौरान पूरे साम्राज्य में यह खबर फैल गई कि इमाम हुसैन ने यज़ीद की सत्ता को मानने से इंकार कर दिया है।
इराक के एक बड़े शहर कूफ़ा के लोगों को जब यह पता चला, तो उन्होंने इमाम हुसैन को हजारों खत लिखे। उन खतों में लिखा था: "हे इमाम! हमारे पास कोई सच्चा रहबर (मार्गदर्शक) नहीं है। आप कूफ़ा आइए, हम सब आपके हाथ पर बैअत करेंगे और यज़ीद के ज़ुल्म के खिलाफ आपका साथ देंगे।"
खतों का सिलसिला इतना बढ़ा कि इमाम हुसैन ने स्थिति का जायजा लेने के लिए अपने चचेरे भाई हज़रत मुस्लिम इब्ने अक़ील को अपना दूत बनाकर कूफ़ा भेजा।
हज़रत मुस्लिम जब कूफ़ा पहुंचे, तो वहां के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। हजारों की तादाद में लोगों ने इमाम हुसैन के समर्थन की कसम खाई। हज़रत मुस्लिम ने इमाम हुसैन को मक्का खत भेजा कि "कूफ़ा के हालात अनुकूल हैं, आप अपने परिवार के साथ यहाँ आ सकते हैं।"
लेकिन यज़ीद को जैसे ही इसकी भनक लगी, उसने कूफ़ा के गवर्नर को बदलकर वहां इब्ने ज़ियाद नाम के एक बेहद क्रूर और बेरहम शख्स को गवर्नर नियुक्त कर दिया। इब्ने ज़ियाद ने कूफ़ा आते ही आतंक का माहौल पैदा कर दिया। उसने घोषणा की कि जो भी इमाम हुसैन का साथ देगा, उसे और उसके परिवार को तड़पा-तड़पा कर मार दिया जाएगा।
पैसों के लालच और मौत के डर से कूफ़ा के लोग रातों-रात बदल गए। जिन्होंने सुबह हज़रत मुस्लिम के पीछे नमाज़ पढ़ी थी, उन्होंने शाम तक उनका साथ छोड़ दिया। हज़रत मुस्लिम को कूफ़ा की गलियों में अकेला घेर लिया गया। उन्होंने वीरता से मुकाबला किया, लेकिन अंततः उन्हें बंदी बना लिया गया और महल की छत से नीचे फेंककर शहीद कर दिया गया। शहीद होने से पहले हज़रत मुस्लिम की आँखों में आंसू थे—वे अपने लिए नहीं रो रहे थे, बल्कि इसलिए रो रहे थे कि उन्होंने इमाम हुसैन को कूफ़ा आने का संदेश भेज दिया था।
इधर मक्का में इमाम हुसैन को हज़रत मुस्लिम की शहादत की खबर नहीं मिली थी। वे हज की तैयारी कर रहे थे। लेकिन उन्हें पता चला कि यज़ीद ने हज के लिबास (अहराम) में कातिल भेजे हैं जो काबा के पवित्र परिसर के भीतर ही इमाम हुसैन की हत्या करना चाहते थे। इमाम हुसैन नहीं चाहते थे कि अल्लाह के घर (काबा) में खून बहे। इसलिए उन्होंने हज शुरू होने के ठीक एक दिन पहले (8 ज़िलहिज्जा) अपने हज को 'उमरा' में बदला और अपने काफ़िले के साथ इराक की तरफ चल पड़े।
रास्ते में उन्हें हज़रत मुस्लिम और उनके दो छोटे बच्चों की बेदर्दी से शहादत की खबर मिली। काफ़िले में सन्नाटा छा गया। इमाम हुसैन ने अपने साथियों से कहा: "कूफ़ा वालों ने गद्दारी की है। जो जाना चाहता है, वह रात के अंधेरे में जा सकता है, मुझ पर कोई आपत्ति नहीं है।" कुछ लोग जो दुनियावी फायदे के लिए साथ आए थे, वे चले गए। अब इमाम हुसैन के साथ सिर्फ उनके परिवार के लोग और कुछ बेहद वफ़ादार साथी बचे थे।
2 मुहर्रम 61 हिजरी को इमाम हुसैन का काफ़िला इराक के एक सूखे और तप्त रेगिस्तान में पहुंचा।
वहां इमाम हुसैन के घोड़े ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। इमाम हुसैन ने स्थानीय लोगों से पूछा,
"इस जगह का नाम क्या है?"
लोगों ने जवाब दिया, "इसे नैनवा कहते हैं।"
इमाम ने पूछा, "इसका कोई और नाम?"
जवाब मिला, "इसे अकर भी कहते हैं।"
इमाम ने फिर पूछा, "क्या इसका कोई और भी नाम है?"
एक बूढ़े व्यक्ति ने कहा, "हुजूर, इसे कर्बला भी कहते हैं।"
यह नाम सुनते ही इमाम हुसैन की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा:
"यही वह जगह है जहाँ हमारे ऊंट बैठेंगे, यही वह जगह है जहाँ हमारा खून बहेगा और यही वह जगह है जहाँ हमारी कब्रें बनेंगी।"
इमाम हुसैन ने वहीं अपने खैमे (तंबू) लगाने का हुक्म दिया।
यज़ीद की फौज का कमांडर उमर इब्ने साद हजारों सैनिकों के साथ वहां पहुंच चुका था। बाद में शिन्र इब्ने ज़िलजौशन भी एक बड़ी सेना लेकर आ गया। यज़ीद की सेना की संख्या लगभग 22,000 से अधिक थी, जबकि इमाम हुसैन के पास केवल 72 जांबाज साथी थे, जिनमें महिलाएं और छोटे बच्चे भी शामिल थे।
7 मुहर्रम को इब्ने ज़ियाद के हुक्म पर यज़ीदी सेना ने फरात नदी (River Euphrates) के घाटों को अपने नियंत्रण में ले लिया और इमाम हुसैन के काफ़िले के लिए पानी पूरी तरह बंद कर दिया। कर्बला की गर्मी, तपती रेत और लगातार तीन दिनों (7, 8, 9 मुहर्रम) तक पानी की एक-एक बूंद न मिलना—यह एक ऐसा दर्द था जिसकी कल्पना भी रूह कंपा देती है। इमाम हुसैन के खैमों से बच्चों के रोने की आवाज़ें आ रही थीं। 6 महीने का मासूम बच्चा अली असग़र प्यास से तड़प रहा था। लेकिन इमाम हुसैन के काफ़िले का कोई भी व्यक्ति यज़ीद के आगे झुकने को तैयार नहीं था।
9 मुहर्रम की शाम को यज़ीदी सेना ने हमले की तैयारी की। इमाम हुसैन ने अपने भाई हज़रत अब्बास को भेजा और कहा कि यज़ीद की फौज से कहें कि हमें एक रात की मोहलत दें, ताकि हम अपने रब (अल्लाह) की इबादत कर सकें। यज़ीदी फौज ने एक रात की मोहलत दे दी।
वह रात इतिहास की सबसे अनोखी रात थी। इमाम हुसैन ने अपने खैमे का चिराग (दीपक) बुझा दिया और अपने साथियों से कहा: "यज़ीदी फौज सिर्फ मेरी जान की दुश्मन है। अगर आप लोग रात के अंधेरे में चले जाएंगे, तो वे आपका पीछा नहीं करेंगे। मैं आप सबको अपनी निष्ठा के बंधन से आज़ाद करता हूँ।"
जब चिराग दोबारा जलाया गया, तो कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला था। इमाम हुसैन के वफ़ादार साथियों और रिश्तेदारों ने रोते हुए कहा: "मौला! अगर हमें 70 बार भी जिंदा करके मार दिया जाए और हमारी राख हवा में उड़ा दी जाए, तब भी हम आपका साथ नहीं छोड़ेंगे।" पूरी रात हुसैन के खैमों से कुरान पढ़ने और अल्लाह को याद करने की आवाजें आती रहीं।
10 मुहर्रम की सुबह (10 अक्टूबर 680 ईस्वी) हुई। इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ सुबह की नमाज़ अदा की। जंग की शुरुआत यज़ीदी कमांडर उमर इब्ने साद द्वारा इमाम के खैमों की तरफ तीर चलाने से हुई। इसके बाद एक-एक करके इमाम हुसैन के साथी मैदान में गए और अपनी वीरता का लोहा मनवाते हुए शहीद हो गए।
दोपहर ढल चुकी थी। इमाम हुसैन का पूरा शरीर तीरों, तलवारों और भालों के घावों से चूर था। वे आखिरी बार खैमे में गए, अपनी बहन हज़रत ज़ैनब और बेटी सकीना को ढांढस बंधाया और धैर्य रखने की वसीयत की।
इमाम हुसैन अकेले मैदान में उतरे। इतने घाव होने के बावजूद जब इमाम हुसैन ने तलवार चलाई, तो यज़ीदी सैनिक भाग खड़े हुए। लेकिन तभी अस्र (तीसरे प्रहर) की नमाज़ का वक्त हो गया। इमाम हुसैन ने अपनी तलवार म्यान में रख ली और अपने रब के सामने सज़दे (प्रार्थना की मुद्रा) में सिर झुका दिया। इसी अवस्था में शिन्र इब्ने ज़िलजौशन नाम के दुष्ट ने सज़दे की हालत में इमाम हुसैन का सिर मुबारक धड़ से अलग कर दिया। वह 10 मुहर्रम 61 हिजरी का काला दिन था, जब मानवता रो पड़ी और इस्लाम का सबसे बड़ा रक्षक शहीद हो गया।
इमाम हुसैन की शहादत के बाद भी यज़ीदियों की क्रूरता खत्म नहीं हुई। उन्होंने पवित्र अहले-बैत (परिवार) के खैमों में आग लगा दी। छोटे बच्चों और महिलाओं के गहने और चादरें छीन ली गईं। 4 साल की बच्ची हज़रत सकीना के कानों से बालियां नोच ली गईं।
इमाम हुसैन के इकलौते जीवित बचे बीमार बेटे हज़रत ज़ैनुल आबेदीन (सैय्यद-ए-सज्जाद) को भारी जंजीरों में जकड़ दिया गया। शहीदों के सिरों को भालों की नोक पर टांग दिया गया और महिलाओं को बिना परदे के, ऊंटों की नंगी पीठ पर बिठाकर सीरिया (दमिश्क) में यज़ीद के दरबार में ले जाया गया।
जब कैदियों को यज़ीद के भरे दरबार में पेश किया गया, तो यज़ीद अपनी जीत के नशे में चूर था। लेकिन इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब ने यज़ीद के भरे दरबार में शेरनी की तरह दहाड़ते हुए वह ऐतिहासिक भाषण (खुत्बा) दिया, जिसने यज़ीद के तख्त को हिला कर रख दिया। उन्होंने कहा:
"ऐ यज़ीद! तूने क्या सोचा कि हमारे पुरुषों को शहीद करके और हमें कैदी बनाकर तूने हमें नीचा दिखा दिया और खुद को बड़ा बना लिया? भगवान की कसम, तू न तो हमारी याद को लोगों के दिलों से मिटा सकता है और न ही इस्लाम को खत्म कर सकता है। तेरी हुकूमत के दिन गिने-चुने हैं और तेरा अंत बेहद शर्मनाक होगा।"
हज़रत ज़ैनब के इस भाषण ने सीरिया की जनता की आँखें खोल दीं। जनता के विद्रोह के डर से यज़ीद को मजबूरन कैदियों को रिहा करना पड़ा और उन्हें ससम्मान मदीना वापस भेजना पड़ा।
कर्बला का वाक़या किसी एक धर्म, संप्रदाय या जाति तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता के लिए एक शाश्वत संदेश है। दुनिया के बड़े-बड़े विचारकों ने इमाम हुसैन के इस बलिदान को नमन किया है:
आज कर्बला के वाक़ये को गुजरे सदियां बीत चुकी हैं। यज़ीद के पास सत्ता थी, धन-दौलत थी, विशाल सेना थी, लेकिन आज इतिहास के पन्नों में उसका नाम केवल ज़ुल्म, अत्याचार और लानत (घृणा) के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। दूसरी ओर, इमाम हुसैन (रज़ि.) जिन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया—आज दुनिया भर के करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करते हैं। इराक के कर्बला में उनका रौज़ा (मकबरा) आज भी इंसानियत का केंद्र है।
इंसान को बेदार तो हो लेने दो,
हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन।